बोकारो। 
झारखंड सरकार की प्रस्तावित औद्योगिक नीति 2026 के लिए देश के उद्यमियों एवं आम नागरिकों से मांगे गये सुझाव पर एमएसएमई एसोसिएशन आफ झारखंड के अध्यक्ष शशि भूषण विश्वकर्मा ने राज्य सरकार को इस निमित्त अपना सुझाव दिया है। अपने सुझाव के जरिए उन्होंने 10 साल के कालखंड के लिए नीति बनाई जाने पर बल दिया है। उन्होंने कहा की सबसे बड़ी समस्या स्थानीय लघु उद्योग के उत्पाद के बाजार का है। यहां के बड़े उद्यमी और राज्य सरकार और केंद्र सरकार स्थानीय उद्योगों के उत्पादन को खरीदना मुनासिब नहीं समझते। उन्होंने कहा है कि राज्य सरकार अपनी नीति में वोकल फॉर लोकल के तहत 25% स्थानीय इकाइयों से ही खरीदने की गारंटी करे। इसी तरह उन्होंने राज्य सरकार और केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए क्लस्टर की चर्चा की और कहा कि उनकी जो रो मटेरियल है लोहा लकड़ी और अन्य सामान उपलब्ध कराने की कोई स्पष्ट नीति नहीं है जिसके कारण सभी क्लस्टर घाटे में चल रहे हैं या बीमार हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि कच्चे माल की सप्लाई का इतना बुरा हाल है कि आजादी के पहले की इकाई एसीसी सीमेंट झींकपानी में रॉ मैटेरियल होते हुए संयंत्र को बंद करने को विवश हो गयी। बिना जमीन का उद्योग नहीं लगेगा औद्योगिक नीति में जमीन की उपलब्धता के बारे में प्रत्येक जिले में जमीन बैंक के बारे में स्पष्ट घोषणा एवं नीति होनी चाहिए, अन्य राज्यों में निजी क्षेत्र में स्पेशल इकोनामिक जोन इंडस्ट्रियल पार्क की स्थापना हो रही है औद्योगिक नीति में इसकी स्पष्ट घोषणा होनी चाहिए, जिसकी कमी दिखाई दे रही है। झारखंड में इंडस्ट्रियल सब्सिडी लागत के आधार पर दी जाती है, उन्होंने सुझाव दिया कि इसमें बहुत दिक्कत है। भ्रष्टाचार भी होता है। अतः उद्योगों को उनकी उत्पादकता के आधार पर या टर्नओवर के आधार पर सब्सिडी दिया जाए एवं जीएसटी पूर्ण रूप से 5 साल के लिए नहीं लिया जाए। उन्होंने प्रस्तावित औद्योगिक नीति में बोकारो को विकसित जोन में डाल करके किसी भी विशेष सुविधा से वंचित किया है इसका विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि बोकारो का 80% क्षेत्र जो है वह पिछड़ा है और यहां पर औद्योगिक विकास की संभावना है। जरूरत है इसको विकसित जोन से बाहर किया जाए या जोन 1 के जितने भी जिले हैं उनको भी विशेष लाभ दिया जाए। क्वालिटी अवेयरनेस में जो खर्च है, उत्पादकता बढ़ाने में जो खर्च है, एनर्जी कंजर्वेशन में जो खर्च है, इन सब में सरकार उद्यमियों को सब्सिडी देकरमदद करें।ज्ञइस उद्देश्य से प्रत्येक जिले के स्नातक अभियंत्रण कॉलेज में गुणवत्ता केंद्र स्थापित किया जाए ,सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस की स्थापना हो, टेक्नोलॉजी सेंटर की स्थापना हो और सभी उद्योगों को वहां से मदद किया जाए। एक जमाने में केंद्र की योजना थी,जो अभी चलती हुई दिखाई नहीं देती है, उन्होंने लिखा है कि राज्य में सिंगल विंडो सिस्टम दिखाने के लिए है। हर विभाग अपना चलाता है। इसमें समय सीमा आधारित सिस्टम पॉलिसी में ही घोषित हो जानी चाहिए। उसके बाद जिसको उद्योग लगाना होगा लगाएगा, नहीं लगाना होगा नहीं लगाएगा। पैसा फंसा करके परेशान तो नहीं होगा। उन्होंने कहा कि जिला स्तरीय या औद्योगिक प्राधिकार स्तरीय जो स्थानीय कार्यालय हैं, उनको भी समस्या समाधान करने का अधिकार मिलना चाहिए,जिससे कि उद्यमियों को मदद मिले और उनकी समस्याओं का समाधान जल्दी हो। सबसे बड़ी समस्या औद्योगिक विवाद है, बड़े-बड़े ठेकेदार, बड़े-बड़े उद्योग, छोटे उद्योगों को पेमेंट नहीं देते, उनका पेमेंट रोक देते हैं और विवाद जब उद्योग सचिव तक जाता है तो उनके ट्रांसफर या उनके प्रमोशन के बाद वह मामला फिर नीचे आ जाता है। अतः इसको देखते हुए औद्योगिक विवादों को निपटाने के लिए एक अस्थाई समिति का गठन हो, जिसमें व्यावसायिक संस्थानों के प्रतिनिधि भी शामिल हो। उन्होंने सरकार का ध्यान झारखंड के वनों में अवैध कटाई की ओर आकृष्ट करते हुए कहा कि बंगाल, उड़ीसा और बिहार में वनों की कटाई पर रोक न होने के कारण झारखंड के वन बर्बाद हो रहे हैं और यहां के वन उत्पाद का भी उपयोग रोजगार के लिए नहीं हो रहा है। अतः सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित आधुनिक वन विकास नीति को लागू करें, जिससे कि वन भी रहे और वनों पर आधारित उद्योग भी अनवरत चलता रहे। और पड़ोसी राज्यों को इसका दुरुपयोग करने का मौका ना मिले। लकड़ी मिल को नए ढंग से लाइसेंस देने की जरूरत है, जिससे कि रोजगार का सृजन हो , पॉलिसी में कोयला आधारित उद्योगों को प्रतिबंधित क्षेत्र में रखा गया है, जो गलत है आज की तारीख में प्रदूषण रहित आधुनिक कोयला उद्योग सामने आ रहा है। सरकार को उसको बढ़ावा देना चाहिए और अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए। राज्य में कोयला का भंडार सीमित है अतः भविष्य की योजनाओं को ध्यान में रखते हुए और केंद्र सरकार की आणविक संयंत्रों की स्थापना की नीति को ध्यान में रखते हुए सरकार को अपने औद्योगिक नीति में चांडिल डैम तिलैया डैम या पतरातू डैम पर आधारित एटॉमिक पावर प्लांट की स्थापना के लिए एक स्पष्ट नीति घोषित करनी चाहिए और इसके साथ ही गैर पारंपरिक क्षेत्र में निजी भागीदारी को भी सुनिश्चित करना चाहिए। जिससे कि ग्रीन ऊर्जा का उत्पादन हो सके।उन्होंने राज्य की जमीन नीति की कमियों को उजागर करते हुए ध्यान दिलाया कि राज्य सरकार अपने द्वारा दिए गए ही जमीन को केंद्र की सबसे बड़ी योजना इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर ,जो बोकारो स्टील प्लांट की जमीन पर स्थापित होना है, स्थापित नहीं कर पा रही है क्योंकि बोकारो इस्पात संयंत्र जमीन नहीं दे रहा है या दे भी रहा है तो बहुत अधिक दाम ले रहा है। अतः इसके लिए स्पष्ट नीति बननी चाहिए कि भविष्य में समस्या ना हो, अन्य राज्यों की भांति सभी विश्वविद्यालय को यहां के बड़े उद्योगों के साथ जोड़ना चाहिए, क्या पढ़ना है, किस विषय को पढ़ना है ,इन सभी पर यहां के विश्वविद्यालय, यहां के उद्योगों से वार्ता करें और उसके बाद बच्चों को पढ़ाया जाय। जिससे कि बच्चों में भी पढ़ाई के प्रति लगाव हो और बच्चे कॉलेज जाने में रुचि रहे और पढ़ाई करें इसके अलावा यहां के उद्योगों को पॉलिसी के तहत कैंपस इंटरव्यू करने का एक प्रावधान किया जाए, ऐसा करने से भी कॉलेज का महत्व बढ़ेगा और वहां छात्र जाएंगे। आज की तारीख में झारखंड के सभी सभी बड़े-बड़े कॉलेज खड़े तो हैं ,लेकिन छात्रों से खाली है सिर्फ वहां के शिक्षक तनख्वाह ले रहे हैं ।अतः आधुनिक रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर औद्योगिक नीति को बनानी चाहिए।
