



सम्राट चौधरी और नीतिन नवीन की प्रतिष्ठा को जोरदार झटका
0 अजय अश्क
पटना। बिहार के बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत का मतलब बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव का ही नहीं बल्कि आम जनता के सामने एक विकल्प के उभरनंे का संकेत है। बिहार में जन सुराज ने अपना खाता खोल लिया है। इस सफलता ने जन सुराज को एक नयी ताकत दे दी है। जनसुराज की जीत ने अब तक पिछले कई दशक से लालू व नीतिश में उलझी बिहार की राजनीति को उससे बाहर निकालने या नये गठबंधन बनाने की राह बता गयी है। यह जीत भाजपा के 31 साल पुराने और बेहद सुरक्षित गढ़ में सेंध, पारंपरिक जातिवादी राजनीति को चुनौती, और राज्य में एक मजबूत तीसरी ताकत के उदय का संकेत देती है। इसका राजनीतिक मायने और संदेश बीजेपी के गढ़ में सेंधमारी मानी जा रही है। पटना की बांकीपुर सीट पर 1995 से लगातार बीजेपी का कब्जा था, जिसे पीके के जनसुराज पार्टी ने बेदखल कर अपना झंडा लहरा दिया है। उन्होंने करीब 19,324 वोटों से भाजपा को हराकर इतिहास रच दिया। कभी रणनीतिकार रहे और अब बिहार को राजनीतिक विकल्प देने का मकसद लेकर सीधे चुनावी राजनीति में उतरे प्रशांत किशोर की यह पहली और धमाकेदार जीत है। उनकी जीत ने बिहार में राजनीति के तीसरे विकल्प की शुरुआत कर दी है। बिहार के राजनीतिक गलियारों में इस जीत को एनडीए और महागठबंधन के अलावा एक नए और वैकल्पिक राजनीतिक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
बिहार की राजनीति पर इसका असर होना तय है। चुनाव परिणाम ने पारंपरिक जाति और धर्म आधारित समीकरणों को दरकिनार कर अब स्वच्छ शासन व विकास के साथ साथ भ्रष्टाचार मुक्त शासन और विकास के मुद्दों पर बहस छेड़ दी। जन सुराज पार्टी, जो पिछले विधानसभा चुनावों में बुरी तरह फलाप रही थी,अब इस नतीजे ने उनके अंदर जान डाल दी है। पार्टी ने बता दिया हे कि जन मुददो को लेकर वह आवाज उठाती रही है और आम चुनाव में मिली असफलता के बाद भी वह लगातार अपने अभियान में लगी रही और पार्टी को हासिए पर माननेवाले लोगों को अपनी ताकत दिखा गयी है। इस जीत से जनुसराज के कार्यकर्ताओं और समर्थकों का मनोबल अब काफी बढ़ गया है।
प्रशांत किशोर को बांकीपुर विधान सभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में 19 हजार से अधिक वोटों से जीत मिली है। इससे बिहार विधानसभा का गणित नहीं बदलेगा,लेकिन इसने बिहार में राजनीति को लेकर बहस तेज कर दी है। एक तरफ निराशा का भाव व दूसरी ओर तीसरा विकल्प पर बहस तेज की है। उपचुनाव के नतीजे को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ जनमत नहीं माना जा सकता। हां गुस्सा के तौर पर देखा जरूर जा सकता। विपक्ष के भविष्य को लेकर भी कोई सपना नहीं गढ़ा जा सकता। फिर भी इसके गहरे मायने हैं। इस उपचुनाव को मौजूदा शासन के खिलाफ असंतोष और गुस्सा के तौर पर देख जा रहा है। बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट के साथ ही हालंाकि तीन उपचुनाव हुए, जिसमें दो पर भाजपा को झटका लगा है। बिहार की बांकीपुर व एमपी का दतिया भाजपा हार चुकी है। गुजरात की मांजलपुर की एक मात्र सीट पर भाजपा को सफलता मिल गयी है। बांकीपुर के साथ साथ अगर मध्य प्रदेश की दतिया सीट के रिजल्ट पर गौर करे तो भाजपा के लिए निराशा जनक ही माना जा सकता है। हिंदीभाषी इलाके में भाजपा को यह झटका अमित शाह, नरेंद्र मोदी और नितिन नवीन की तिकड़ी के लिए जोर का जोरदार झटका है। इसका यूपी के चुनाव पर असर पड सकता है या नहीं इसको लेकर भी बहस होने लगी है। दतिया की सीमा यूपी के झांसी से लगती है। इसे कुछ लोग यूपी चुनाव पर असर पडने के तौर पर देख रहे है।
जन सुराज पार्टी के संस्थापक और चुनाव रणनीतिकार बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में जीत गए है। यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद ख़ाली हुई थी। इस जीत ने पी के को विधायक बनाया है, तो उनकी पार्टी जो बिहार में जमीन तलाश रही थी, उसे आधार भी दिया है।
प्रशांत किशोर, बीजेपी के उम्मीदवार नीरज कुमार से 19,324 से अधिक वोटों से जीत दर्ज कर पहली बार विधायक बने। उन्हें कुल 64 हजार 151 वोट मिले जबकि भाजपा को 44 हजार 827 वोट मिले। महागठबंधन को तीसरे स्थान पर ही रहना पडा। अब जरा परिस्थितियों व कारणों पर गौर करे तो कई कारक इस चुनाव नतीजे को लेकर चर्चा में हैं।
यह उप चुनाव उस सीट के लिए था,जो राज्य सभा में जाने के कारण भाजपा के नेशनल प्रेसीडेंट नीतिन नवीन खाली कर गये थे। इस सीट पर भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी। बिहार में एक तरफ पहली बार भाजपा की सरकार सम्राट चौधरी के नेतृत्व में आयी और दूसरी ओर सीट खाली करनेवाले नीतिन नवीन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये। दोनों के कार्यकाल में उनके ही राज्य में चुनाव हुआ और यहां पहली ही परीक्षा में दोनों का रिजल्ट फेल साबित रहा। इस नतीजे से बिहार के नेतृत्व की कहिए या पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व की दोनों की अग्नि परीक्षा में उम्मीद पर खरे नहीं उतर सके हैं। इन दोनों को जबरदस्त झटका लगा है। इसे ही कह सकते है प्रथमे ग्रासे मच्छिका पातः।
अब जरा उन कारकों पर गौर फरमाते हैं जो इस जीत-हार के कारण बनें,जिन्होंने प्रशांत को विधायक बनाया और भाजपा को ध्ूाल चटायी। चुनाव के दौरान देश के जंतर मंतर पर काकरोच केन्द्र सरकार के खिलाफ शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र का सवाल लेकर आंदोलन कर रहे थे और इसे कुचलने के लिए पुलिस अपनी ताकत दिखा रही थी। इसका बिहार में भी असर दिखा था। बिहार में भी लोगांे का गुस्सा दिख रहा था। सड़क पर हंगामा चल रहा था। और उनसे निपटने के लिए शासन प्रशासन का बिहार में एक्शन भी । जेन जी भी एक फैक्टर के तौर पर रहा है। बिहार मंे विरोध के दौरान एके 47 से फायरिंग, कई की गिरफतारी का सवाल भी गहराया था। दिल्ली में प्रदर्शन के बाद बिहार के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन हुए, सैकड़ों को गिरफ़्तार किया गया। जेपी आंदोलन के बाद पहली बार राजभवन और मुख्यमंत्री सचिवालय तक आंदोलन पहुंच गया और सडको पर हंगामा मचता रहा था। हंगामा से भरा यह इलाका बांकीपुर विधान सभा के क्षेत्र में ही आता है। इसके अलावा यूजीसी ने पहले से ही मामला गरमा कर सवर्ण समाज के एक बड़े मतदाता समूह को भाजपा के खिलाफ भडका रखा है।
भाजपा के परंपरागत वोटर इस मुददे पर भाजपा से भडके हुए हैं। बिहार के भोजपुर ज़िले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव के भरत भूषण तिवारी की पुलिस एनकाउंटर में मौत का मामला भी राजनीति में जोर पकड चुका है। भाजपा के अभिषेक कुमार सिनहा को उम्मीदवार बनाकर नामांकन और फिर अचानक से उन्हे बदलना व नामांकन वापस करने पर विवश करना भी एक कारण रहा है। उनका नामांकन वापस हो गया और नीरज को उम्मीदवार बना दिया गया। कई अन्य लोगों की इस सीट पर उम्मीदवार के तौर पर टकटकी लगी हुई थी। लेकिन उम्मीदवार बना दिया गया नये चेहरे को। भाजपा को गुरूर था की वह जिसे बना कर प्रत्याशी मैदान मे ंउतारेगी उसे जीत मिलेगी। लेकिन जनता जनार्दन ने भाजपा के इस भाव को उखाड़ कर फेंक दिया है। बीजेपी पार्टी के अंदर खाने में समन्वय का अभाव भी दिखा। लगा की बिहार का नेतृत्व सम्राट चौधरी व पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व नीतिन नवीन प्रत्याशी का भंवर पार कर देगा। आरोप है की इसलिए पार्टी के कई नेताओ नेे इमानदार प्रयास नहीं किया। युजीसी भी फैक्टर रही है।
प्रशांत किशोर ने अपनी रणनीति के तहत नीतीन नवीन के बजाय बीजेपी की कमज़ोरियों को उजागर किया है और सम्राट चौधरी को ही अपने निशाने पर रखा। उन पर पर हमला करते रहे। कहा जाता है की कम मतदान भी भाजपा का संकट गहरा गयी। जेडीयू की भूमिका भी इस चुनाव में बहुत नजर नहीं आयी। चुनाव प्रचार के दौरान लगातार देखा गया कि प्रशांत किशोर सरकार के कामकाज की बात करते रहे, जिसका असर हुआ और रिजल्ट भाजपा की बैंड बजा गया।
