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धक्का खाती व्यवस्था, गुस्से में मजिस्ट्रेट और प्रेस की आजादी भाड़ में

बोकारो। सरकार की व्यवस्था आज सड़़क पर धक्का खाने लगी। सरकारी व्यवस्था की यह अवस्था संसाधानों से लैस प्रशासन की चुस्त दुरूस्त व्यवस्था के दावे को आईना दिखाती, उसकी सच्चाई को बयां कर रही थी। मीडिया ने इसे देखा तो स्वाभाविक तौर से उसका कैमरा चमका और व्यवस्था की यह अवस्था हो गयी कैद। लेकिन इसके बाद जो हुआ वह दुर्भाग्यजनक था। मीडिया की यह मजाल की वह व्यवस्था की इस अवस्था पर कैमरा चमका दंे। प्रेस की स्वतं़़त्रता होगी अपनी जगह। प्रशासन की जगहंसाई हो जाए इसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है। चूुंकि व्यवस्था जो सड़क पर हाफ रहीे थी वह मजिस्ट्रेट जया कुमारी से जुडी हुई थी। सड़़क पर तपती दोपहरी में यह मामला कैद हुआ था। दरअसल गाडी थी झारखंड सरकार की। उस पर तख्ती लगा था चास के एक्सक्यूटिव मजिस्ट्रेट की। उस पर सवार थीं चास की कार्यपालक दंडाधिकारी जया कुमारी। वे निकली थीं किसी सरकारी काम से। अचानक से मजिस्ट्रेट की गाड़ी सरेराह किसी तकनीकी अड़चन से बंद हो गयीं। सूरज उपर से आग का गोला बरसा रहे थे। तापमान बढ़ा हुआ था। गरमी ने सब कुछ ठहरा रखा था। मामला मजिस्ट्रेट का था। तुरंत गाड़़ी को धक्का लगाने के लिए लोगों को ढूंढा गया। गाड़ी को धक्का लगाया जाने लगा। मामला  मजिस्ट्रेट और उनकी शान का था। आाखिर कोई ऐरू गैरू तो थीं नहीं, मजिस्ट्रेट थीं मजिस्ट्रेट। गरमी भी थी। वे गाड़ी पर सवार थीं।  धक्का लगाया जा रहा था। तभी पत्रकार युधिष्ठिर को यह दृश्य दिख गया। उसके पत्रकार का भाव जगा और फिर यह कैद हो गया उसके कैमरे में। मजिस्ट्रेट की गाड़ी का यह हाल कैमरे में क्या कैद हुआ गाडी पर शहनशंाह की तरह सवार जया जी को लगा की उनकी पराजय हो गयी। इसके बाद तो उनकी भृकुटि तन गयी। वे गाडी से उतरीं। मजिस्ट्रेट के गुरूर को लगा पत्रकार ने चैलंेज कर दिया है। बस वे तैस खा गयीं। उन्होंने एक दैनिक अखबार के उक्त पत्रकार को जिसने फोटो खींचने का बडा अपराध कर दिया था, उसके कालर खींचे गये। वह बताता रहा की वह पत्रकार है लेकिन जब दिमाग मजिस्ट्रेट का हो  और पारा गरम हाकर सातवें स्थान पर पहुंचा गया हो तो क्या फर्क पड़ना था पत्रकार हो या कोई और। गुुस्से में तमतमायी महिला मजिस्ट्रेट ने जैसा आरोप है उसके कालर पकड़ा। धमकाया। बेईज्जत किया और प्रेस के काम में व्यवघान डालकर प्रेस की स्वतंत्रता की ऐसी की तैसी कर दी। गुस्सा मजिस्ट्रेट का था। वह भी महिला मजिस्ट्रेट और नाम भी जया। हार कैसे मान लें। कानून ठेंगे पर  ंलेकर चलनेवाली मजिस्ट्रेट को यह पता था की वह जो कर रहीं है वह प्रेस की आजादी के दायरे में आता है। उनका व्यवहार अनुचित है। लेकिन मजिस्ट्रेट का गुस्सा था, वे भडक गयी थीं। उनके लिए तो उल जूलूल हरकत करना उनका संवैधानिक अधिकार ही था। उन्होंने पत्रकार को पकड़़ा और फिर पिंडराजोरा थाना के हवाले कर दिया। पत्रकार अपना अपराध जानने का प्रयास करता रहा। लेकिन उसे बताया जाता रहा की पुलिस की कोई गलती नहीं है मजिस्ट्रेट ने पुलिस को हैंडआवर किया है और वे लोग कुछ नही कर सकते। फिर मीडिया को जानकारी मिली और मामला जब गरम होने लगा तब तक मजिस्ट्रेट वहां से जा चुकी थी। मीडिया ने थाना पहुंचकर जब अपने तेवर दिखाए और इसे महंगा सौदा पड जाने की जानकारी दी तो फिर लगा कोई बडी भूल हो गयी है। बडे अधिकारियों का फोन घनधनाया जाता रहा। मामला बिगडने लगा तो फिर पत्रकार को थाना से छोडकर मामले को सुलटाने की कोशिश हुई।  मजिस्ट्रेट  तो बिना कोई शिकायत दिए चल निकली थीे लेकिन पत्रकार ने अपने साथ धटी घटना की शिकायत थाना में लिखित तौर से की है और मजिस्ट्रेट  पर प्रेस की स्वतंत्रता का माखौल उड़ाने व पत्रकार के साथ मजिस्ट्रेट द्वारा  अमर्यादित व्यवहार करने, उसे बेइज्जत कर उसके स्वाभिमान को धक्का पहुंचाने का आरोप लगाया है। मामला एक पत्रकार के मान सम्मान व प्रतिष्ठा का है और इस लिहाज से इस मामले को पत्रकारों और पत्रकारों के स्टेट संगठन ने गंभीरता से लिया है और जिस हिसाब से मामला गरम होता जा रहा है,  यह मामला मजिस्ट्रेट  की हेकड़ी दिखानेवाली महिला अधिकारी पर भारी पड जाए तो कोई आश्चर्य नहीें होगा। वैसे मजिस्ट्रेट ने बताया की वे मजिस्ट्रेट ह,ैं उनका पावर है एफआईआर  करने का लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। मजिस्ट्रेट ने कहा की मीडिया का काम है मीडियाबाजी करना, वह करता रहे। यह कहे जाने पर की फोटो खींच लिया पत्रकार तो उसका काम ही है यह , इसमें उसने क्या गुनाह किया तो मजिस्ट्रेट  जया ने कहा कि क्यों खींचेंगे फोटो। प्रशासन को क्यो बदनाम करना है।         GUSA KYO AAYA M AGISTRATE KO

Udan Live
Author: Udan Live

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