

अजय अश्क
बोकारो। आज की तकनीक के इस तेज रफ्तार दौर में, जहाँ उंगलियाँ स्क्रीन पर फिसलती हैं और सेंड पर टच करते हुए आपका संदेश देेश दुनिया के किसी कोने तक पहुंच जाता है। संदेशा भेजने की इस तेज रफ्तार को हमने अपने इमोंशन की कीमत पर पाई है। जो भावनाएं कभी हाथ से चिट्ठी लिखकर लिफाफे में कैद करने के बाद डाक टिकट साट कर भेजने में दिखती थी, वह आज के तेज रफ्तार संचार माध्यम के दौर में दबती, गुम और खत्म होती गयी है। हां यह सच है कि हम एक क्लिक में पलकें झपकने के पहले ही अपने संदेश सात समंदर पार पहुँचा देने में कामयाब हुए हैं। लेकिन ठहरिए इसने क्या कुछ किया है। आप भी महसूस कर रहे होंगे कि इसने उस खूशबू को छीन ली है, जो किसी अपने के हाथ से लिखी चिट्ठी को छूकर आती थी और सहेज कर रखने की थाती बन जाती थी। पत्र लिखनेवाले व पानेवाले दोनों के इमोशन से जुड़ती थी। हर रोज डाकिया के आने का समय होने या घर की मंुडेर पर किसी पक्षी के बोलने के बाद अपनांे का संदेशा आने का जो ईमोशनल इंतजार डाकिया का किया जाता था, वह लुप्त होता जा रहा है। इस डिजिटल तकनीक की रफ्तार ने सब कुछ लील लिया है। कागज पर स्याही से अपने हाथों से खत लिखने और भेजने में जो अपनत्व, प्यार और भावनाएं छुपी होती थी, वह आज के संचार माध्यम की तेज रफ्तार में गायब हो चुकी है। आज पलक झपकते ही, व्हाट्सऐप, ई-मेल, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और एसएमएस जैसा माध्यम संदेशा को पहुचा तो देता है, लेकिन अपनापन व इमोंशन उससे संभव नहीे। डिजिटल स्पीडी तकनीक ने संचार के कई माध्यमों को लील लिया और अब कुरियर ने डाक विभाग और उसके डाक टिकट को चुनौती दे दी है।
इस तकनीक के भारी पडते देखकर डाक विभाग अपनी भावना से जन भावना को जोड़ने के लिए डाक टिकटों को लेकर बेहद संजीदा है और उसने कोशिश की है कि नयी पीढ़ी जिसने डाक विभाग को समझा ही नहीं, जिसने डाक सेवा का उपयोग करना तो दूर डाक टिकट देखी ही नहीं है। जिसने लेटर बाक्स को जाना ही नहीं है, उनलोगो को डाक विभाग की कार्यशैली से अवगत कराया जाए। डाक टिकट के पीछे छुपे इतिहास व दुनिया से रूबरू कराया जाए और चिटठी के दौर की भावनाएं फिर से जीवित की जाए। इसी मकसद से विश्व डाक दिवस और राष्ट्रीय डाक सप्ताह के मौके पर डाक विभाग ने स्थानीय डीएवी पब्लिक स्कूल में फिलाटेली प्रदर्शनी लगायी और डाक टिकट के जरिए बच्चों को देश दुनिया के सभी विषयों की जानकारी सुलभ करायी। आज के तकनीक के दौर के बच्चे डाक विभाग, डाक टिकट और यहां तक की लाल रग के लेटर बॉक्स से रूबरू हुए और उसके महत्व को समझा। बच्चों का उत्साह साफ साफ झलक रहा था। रील्स और वीडियो में व्यस्त बचपन को डाक विभाग की असलियत से वाकिफ कराया गया जो उनके लिए रोमांचक रहा।
बच्चों को तो छोड़िये, अन्य लोगों को भी इस प्रदर्शनी ने समझाया एक छोटा सा डाक टिकट सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं होता। वह बिना कोई किताब खोले हमें देश-दुनिया के इतिहास, महान नायकों और हमारी संस्कृति की सैर करा देता है। यह डाक टिकट मामूली नहीं, यह इतिहास की टाइम मशीन हैं, जिसने अपने अंदर बहुत कुछ कैद कर रखा है। देश-दुनिया की संस्कृति, कला, विज्ञान और क्रांतियों को अपने भीतर समेटे हुए ज्ञान का समंदर और भी ना जाने क्या क्या। पूरी दुनिया का इतिहास, भूगोल और संस्कृति साफ नजर आती है। हर टिकट के पीछे छुपा है एक अनकहा संदेश, देश-दुनिया की कहानी और कला का बेजोड़ नमूना।


आज के डिजिटल और हाइटेक जमाने में जहाँ ईमेल, व्हाट्सएप, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और एसएमएस ने चिट्ठियों की जगह ले ली है, वहीं डाक विभाग ने बोकारो में फिलाटेली प्रदर्शनी लगाकर नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक अनूठा प्रयास किया है। रार्ष्ट्रीय पोस्टल सप्ताह के दौरान डीएवी स्कूल बोकारो में लगी इस प्रदर्शनी में बच्चों को न सिर्फ भारतीय डाक की समृद्ध विरासत को निहारने का मौका दिया बल्कि इसके जरिए बहुत कुछ जानने का अवसर भी दिया। प्रदर्शनी में एक से एक दुलर्भ डाक टिकटों के जरिए देश-दुनिया के इतिहास, संस्कृति और विज्ञान से भी बच्चे रूबरू हुए। डाक विभाग ने इमोशन की बात पर ज्यादा फोकस किया तो यह भी बताया कि डाक टिकट चिट्ठी भेजने का माध्यम है तो निवेश का भी एक बड़ा मंच है जो उनके जीवन को चमत्कारिक तौर से बदल कर उन्हें अमीर बना सकता है।

हालांकि आज के तकनीक के दौर में डाक विभाग से लोगों का कटना डाक टिकट संग्रह करनेवाले शौकीनों को निराश कर रहा है। लेकिन वे मानते हें कि तकनीक चाहे जितनी प्रगति कर ले, वह डाक टिकटों को रिप्लेस कर भावनाएं नहीं बना सकती। डाक टिकट संग्रह करने के शौकीन इस दौर को डाक टिकट पर भारी पड़ने का दौर माना है। उन्हें डाक टिकटों पर ग्रहण लगते, उनके दिन लदते दिखने लगे हैं।
इस हताशा और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी डाक विभाग उत्साह से नयी पीढ़ी को अपने अभियान से जोड़ने का प्रयास कर उन्हें डाक टिकट की दुनिया को समझने व समझाने के लिए समाज के प्रबुद्ध लोगो का सहारा ले रहा है। प्रयास यह है कि बच्चों में डाक टिकट के प्रति लगाव पैदा हो सके। इसके लिए विभिन्न स्कूलों को अपने अभियान का हिस्सा बना रहा है। आज के डिजिटल युग में ई-मेल, व्हाट्सऐप, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और एसएमएस जैसी तकनीकों के कारण पत्रों का चलन बेहद कम हो गया है। तकनीक भले ही डाक विभाग पर भारी पड़ रही है, लेकिन जो आत्मीयता और भावनाएं (इमोशन) एक हाथ से लिखे पत्र में होती थीं, वह तकनीक के संदेशों में नहीं मिल पातीं। यह भी बताने का प्रयास किया जा रहा है ताकि आने वाली पीढ़ी मोबाईल की क्लिक की वाटसअप की ब्लू टिक से बाहर निकल कर यह जान सके कि मशीनी जिन्दगी से बाहर भी एक ऐसी जिंदगी है जो डाक टिकटों के जरिए भेजे गये उन कागजों में धड़कती थी, जिन्हें सहेजने के लिए कभी पूरी उम्र कम पड़ जाती थी।
आज की नई पीढ़ी के बच्चों ने तो डाक विभाग की कार्यशैली से परिचित कराया गया। पोस्ट बॉक्स और डाक के बारे मंे बताया गया। इस प्रदर्शनी के माध्यम से बच्चों को न केवल पोस्ट बॉक्स दिखाया, बल्कि उनके भीतर डाक प्रणाली के प्रति गहरी रुचि भी जगाई। यह भी बताया गया कि आज की तकनीक तेज रफतार तो देती है, लेकिन इमोशंस नहीं दे सकती। आपकी हाथ की चिट्ठी एक यादगार दस्तावेज बन सकती है। आपकी थाती हो सकती है। जबकि आज का डिजिटल संचार तंत्र यह अवसर नहीं देता। आप उसके संदेश को सहेज कर नहीं रख सकते और रख भी लिया तो वह इमोंशंस कहां से लायेेंगे जो डाक संसार से मिलते रहे हैं। बहरहाल डाक विभाग की यह डाक टिकटों के प्रति रूचि जगाने की यह पहल निराशा के इस दौर में तकनीक की चुनौतियों से लड़ते हुए अपनी पहचान और मानवीय भावनाओं को बचाए रखने का एक सराहनीय और प्रभावकारी कदम रहा। यह बता गया कि व्हाट्सऐप के ब्लू टिक और ई-मेल के इनबॉक्स से बाहर ऐसी दुनिया है जहाँ सेंड का बटन उँगलियों से नहीं, दिल की धड़कनों से दबता था। और यह कर दिखाता था कागज पर छपा डाक टिकट। इसी के जरिए लोग अपनों को भेजते थे अपने दिल की भावनाएं। हां समय जरूर लगता था,इसे पहुंचने में, लेकिन इसे पाने के बाद लगता था मानों सब कुछ मिल गया है। असली इमोशन किसे कहते हैं। बच्चों ने जाना और उनकी समझ में यह आ गयी कि मोबाइल के मैसेज तो एक डिलीट बटन से गायब हो जाते हैं, लेकिन ये टिकट सदियों का इतिहास सीने से लगाए ज़िंदा रहते हैं। इनके जरिए पहुंचायी गयी भावनाएं थाती बन जाती थीं। यह भी समझा दिया गया कि तकनीक कितनी भी हावी हो जाए, लेकिन कभी इंसानी भावनाओं की जगह नहीं ले सकतीं।

